।। श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः ।।महानुभाव आप सभी के आग्रह पर – वाजसनेयि तर्पण विधि:

1. नदी या पोखर (तालाब) में भींगा हुआ वस्त्र पहनकर ही नाभि तक पानी में खड़े होकर तर्पण करना चाहिए। अगर घर में तर्पण करना है, तो घर के बाहरी क्षेत्र में सूखा शुद्ध वस्त्र पहनकर तर्पण करें।

2. वर्तमान समय में अधिकांश सभी लोग घर पर ही तर्पण करते हैं, अतः सामग्री यथा :- एक आसन, एक बड़ा जलपात्र लोटा, तिल, यव (जौ), कुश की तेकुशा 2, विरणी – 1, अंगूठी -1, मोड़ा – 1 एवं ताम्बा या काँसा का एक बड़ा पात्र जलांजलि हेतु रखें।

3. बाएँ हाथ में विरणी धारण करें, दाएँ हाथ के अनामिका अंगुली में अंगूठी धारण करें, और एक तेकुशा भी दाएँ हाथ में धारण करें, तथा एक तेकुशा जलांजलि पात्र के बीच में रखें।

4. पूर्व मुँह आसन पर बैठकर पवित्रीकरण करें, तीन बार आचमनी करें, गायत्री मन्त्र पढ़कर शिखा बांध लें, एवं गायत्री मन्त्र से तीन बार जल को अभिमंत्रित कर तिलक कर लें।

5. हाथ में जल लेकर संकल्प करें :- संक्षिप्त में
ॐ अद्य श्रुतिस्मृति पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थं देव ऋषि मनुष्यपितृ तर्पणं महं करिष्ये।

6. देव तर्पण – पूर्वाभिमुख होकर, दाहिने हाथ में तेकुशा, यव और जल लेकर:
आवाहन करें – ॐ तर्पणीया देवा: आगच्छन्तु।

(यव और जल जलांजलि पात्र के तेकुशा पर गिरावें)
अब एक-एक अंजलि जल से देव तर्पण करें, हाथ के अग्र भाग से देवतीर्थ से जल गिराते हुए यथा :-
ॐ ब्रह्मा तृप्यताम्, ॐ विष्णु: तृप्यताम्, ॐ रुद्र: तृप्यताम्, ॐ प्रजापति: तृप्यताम्,
ॐ देवा: यक्षास्तथा नागा: गन्धर्वाऽपसरसोसूरा:।
क्रूरा: सर्पा: सुपर्णाश्च तरवो जृम्भका: खगा:।।
विद्याधरा जलाधारा: तथैवाकाशगामिनः।
निराधाराश्च ये जीवा: पापेऽधर्मे रताश्च ये।।
तेषामाप्यायनायैतद् दीयते सलिलं मया।।

7. सनकादि ऋषि तर्पण :- उत्तराभिमुख होकर यज्ञोपवीत को कंठ लम्बित करके कायतीर्थ से अर्थात कनिष्ठा के मूल भाग से एक-एक अंजलि जल गिराते हुए।
ॐ सनकादय आगच्छन्तु। आवाहन करें और
ॐ सनकस्तृप्यताम्। ॐ सनन्दनस्तृप्यताम्।
ॐ सनातनस्तृप्यताम्। ॐ कपिलस्तृप्यताम्।
ॐ आसूरिस्तृप्यताम्। ॐ वोढुस्तृप्यताम्।
ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम्।

8. मरीच्यादि ऋषि तर्पण :- पूर्वाभिमुख होकर जनेऊ को सव्य कर लें देवतीर्थ अर्थात हाथ के अग्र भाग से जल गिरावें, तेकुशा हाथ में ही रखें। एक-एक अंजलि जल दें,
ॐ मरीच्यादय आगच्छन्तु। आवाहन करें,
ॐ मरीचिस्तृप्यताम्। ॐ अत्रिस्तृप्यताम्।
ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम्। ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम्।
ॐ पुलहस्तृप्यताम्। ॐ क्रतुस्तृप्यताम्।
ॐ प्रचेतास्तृप्यताम्। ॐ वशिष्ठस्तृप्यताम्।
ॐ भृगुस्तृप्यताम्। ॐ नारदस्तृप्यताम्।

9. दिव्य-पितृ तर्पण :- दक्षिणाभिमुख एवं अपसव्य होकर, जलांजलि पात्र भी दक्षिणाभिमुख करके, तेकुशा को रखकर मोड़ा हाथ में लेकर पितृ तीर्थ (अंगुष्ठ व तर्जनी के मध्य भाग) से जल गिरावें एक-एक अंजलि या 3-3 अंजलि।

आवाहन करें :-
ॐ अग्निष्वात्तादय आगच्छन्तु।
ॐ अग्निष्वात्तास्तृप्यन्ताम्। इदं जलं तेभ्यः स्वधा नमः।
ॐ सौम्यास्तृप्यन्ताम्। इदं जलं तेभ्यः स्वधा नमः।
ॐ हविष्मन्तस्तृप्यन्ताम्। इदं जलं तेभ्यः स्वधा नमः।
ॐ ऊष्मपास्तृप्यन्ताम्। इदं जलं तेभ्यः स्वधा नमः।
ॐ सुकालिनस्तृप्यन्ताम्। इदं जलं तेभ्यः स्वधा नमः।
ॐ बर्हिषदस्तृप्यन्ताम्। इदं जलं तेभ्यः स्वधा नमः।
ॐ आज्यपास्तृप्यन्ताम्। इदं जलं तेभ्यः स्वधा नमः।

10. यम तर्पण:- उपरोक्त विधि से तीन-तीन अंजलि जल दें।

आवाहन करें :-
ॐ यमादय आगच्छन्तु। ॐ यमाय नमः।
ॐ धर्मराजाय नमः। ॐ मृत्यवे नमः।
ॐ अन्तकाय नमः। ॐ वैवस्वताय नमः।
ॐ कालाय नमः। ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः।
ॐ औदुम्बराय नमः। ॐ दध्नाय नमः।
ॐ नीलाय नमः। ॐ परमेष्ठिने नमः।
ॐ वृकोदराय नमः। ॐ चित्राय नमः।
ॐ चित्रगुप्ताय नमः।

अब :- ॐ चतुर्दशैते यमा: स्वस्ति कुर्वन्तु तर्पिता:।
इस मन्त्र को पढ़कर प्रणाम करें।

11. पितृ तर्पण :- पूर्ववत-दक्षिणाभिमुख होकर हाथ में मोड़ा, तिल, जल लेकर तीन-तीन अंजलि दें।

आवाहन करें मंत्र :-
ॐ आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्तु अपोऽञ्जलीम्।

अब तर्पण करें पुरुष पक्ष में यथा :-
ॐ अद्य अमुक गोत्र: पिता अमुक शर्मा (पिता का नाम) तृप्यतामिदं सतिलं जलं “तस्मै स्वधा” – 3 बार
ॐ अद्य अमुक गोत्र: पितामह: अमुक शर्मा (दादा का नाम) तृप्यतामिदं सतिलं जलं “तस्मै स्वधा” – 3 बार
ॐ अद्य अमुक गोत्र: प्रपितामह: अमुक शर्मा (परदादा का नाम) तृप्यतामिदं सतिलं जलं “तस्मै स्वधा” – 3 बार फिर “ॐ तृप्यध्वम्” – 3 बार जल दें।
ॐ अद्य अमुक गोत्र: (नाना का गोत्र) मातामह: अमुक शर्मा (नाना का नाम) तृप्यतामिदं सतिलं जलं “तस्मै स्वधा” – 3 बार जल दें।
ॐ अद्य अमुक गोत्र: (नाना का गोत्र) प्रमातामह: अमुक शर्मा (परनाना का नाम) तृप्यतामिदं सतिलं जलं “तस्मै स्वधा” – 3 बार जल दें।
ॐ अद्य अमुक गोत्र: (नाना का गोत्र) वृद्ध प्रमातामह: अमुक शर्मा (परनाना के पिता का नाम) तृप्यतामिदं सतिलं जलं “तस्मै स्वधा” – 3 बार जल दें, फिर ॐ तृप्यध्वम् 3 बार जल दें।

स्त्री पक्ष में यथा :-
ॐ अद्य अमुक गोत्रा (अपना गोत्र) माता अमुकी देवी (माता का नाम), तृप्यतामिदं सतिलं जलं “तस्यै स्वधा” – 1 बार जल दें।
ॐ अद्य अमुक गोत्रा (अपना गोत्र) पितामही अमुक देवी (दादी का नाम) तृप्यतामिदं सतिलं जलं “तस्यै स्वधा” – 1 बार,
ॐ अद्य अमुक गोत्रा (अपना गोत्र) प्रपितामही अमुक देवी (परदादी का नाम) तृप्यतामिदं सतिलं जलं “तस्यै स्वधा” – 1 बार फिर ॐ तृप्यध्वम् – 1 बार जल दें।
ॐ अद्य अमुक गोत्रा (नाना का गोत्र) मातामही अमुक देवी (नानी का नाम) तृप्यतामिदं सतिलं जलं “तस्यै स्वधा” – 1 बार।
ॐ अद्य अमुक गोत्रा (नाना का गोत्र) प्रमातामही अमुक देवी (परनानी का नाम) तृप्यतामिदं सतिलं जलं “तस्यै स्वधा” – 1 बार।
ॐ अद्य अमुक गोत्रा (नाना का गोत्र) वृद्ध प्रमातामहि अमुक देवी (परनानी की माता का नाम) तृप्यतामिदं सतिलं जलं “तस्यै स्वधा” – 1 बार, फिर
ॐ तृप्यध्वम् एक बार जल दें :-

अब आगे नीचे लिखे मन्त्र से जलांजलि दें :-
ॐ येऽबान्धवा बान्धवाश्च येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।
ते तृप्तिमखिला यान्तु यश्चास्मत्तोऽभिवाञ्छति।।

अब धोती के खूँट को जल से भींगा कर गाड़ते हुए :-
मन्त्र पढ़ते हुए :- अतृप्त पितृ को तृप्त करें – यथा
ॐ ये चाऽस्माकं कुले जाता, अपुत्रा गोत्रिणो मृताः।
ते पिबन्तु, मया दत्तं, वस्त्र निष्पीडनोदकम्।।

अब नीचे लिखे मन्त्र से सूर्य को अर्घ दें। पूर्वाभिमुख खड़े होकर
ॐ नमो विवस्वते ब्रह्मन् भास्वते विष्णु तेजसे।
जगत सवित्रे शुचये सवित्रे कर्मदायिने।।
एषोऽर्घ: ॐ भगवते श्री सूर्याय नमः।।

🙏🙏🙏🙏 इति 🙏🙏🙏🙏

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