क्यों जीते-जी अपना पिंडदान कराते हैं लोग?

बॉलीवुड फिल्म देवदास में आत्म पिंडदान का दृश्य भले ही कहानी का हिस्सा हो, लेकिन मोक्ष की नगरी गयाजी में यह सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा आज भी जीवंत है। जनार्दन स्वामी मंदिर दुनिया का ऐसा अनोखा पिंडवेदी स्थल माना जाता है, जहां जीवित व्यक्ति स्वयं अपना पिंडदान कराता है।

फिल्म देवदास में आत्म पिंडदान का दृश्य चर्चा में रहा था, लेकिन गयाजी के भस्मकूट पर्वत स्थित जनार्दन स्वामी मंदिर में यह केवल फिल्मी कल्पना नहीं, बल्कि प्राचीन धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। यहां श्रद्धालु विशेष परिस्थितियों में स्वयं का पिंडदान कराते हैं। मंदिर के पुजारियों के अनुसार, आत्म पिंडदान के बाद व्यक्ति को धार्मिक रूप से सांसारिक बंधनों और मोह-माया से मुक्त माना जाता है। यह अनुष्ठान सामान्य पितृ पिंडदान से अलग और अत्यंत विशेष धार्मिक विधान माना जाता है।

गयाजी में वर्तमान में मौजूद 45 पिंडवेदियों में जनार्दन स्वामी मंदिर ही ऐसा स्थल है, जहां पूर्वजों के बजाय जीवित व्यक्ति का पिंडदान कराया जाता है। यह मंदिर भस्मकूट पर्वत पर मां मंगला गौरी मंदिर के समीप स्थित है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जनार्दन स्वामी मंदिर में भगवान विष्णु बाल स्वरूप में विराजमान हैं। मान्यता है कि इस प्राचीन मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने किया था और समय-समय पर कई राजाओं ने इसका जीर्णोद्धार कराया।

मोक्ष की नगरी गयाजी में पितरों के पिंडदान के साथ-साथ इस अनोखी परंपरा को जानने और विशेष धार्मिक उद्देश्य से आत्म पिंडदान कराने के लिए भी देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह परंपरा गयाजी की धार्मिक पहचान को और भी विशिष्ट बनाती है।

सवाल- क्या वास्तव में कोई व्यक्ति अपना पिंडदान कर सकता है?
जवाब- जनार्दन स्वामी मंदिर के पुजारी आकाश गिरी बताते हैं कि गयाजी का तीर्थ क्षेत्र अत्यंत फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गयासुर ने भगवान विष्णु और ब्रह्मा की कठोर तपस्या कर वरदान प्राप्त किया था। इसी कारण गयाजी में विधि-विधान से किए गए पिंडदान और पूजा-अर्चना से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। यहां विशेष परिस्थितियों में जीवित व्यक्ति भी अपना आत्म पिंडदान कर सकता है।

सवाल- आत्म पिंडदान की परंपरा की शुरुआत कब और कैसे हुई?
जवाब- यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। गयासुर की कथा और गरुड़ पुराण सहित कई धार्मिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। गयाजी में पहले 300 से अधिक पिंडवेदियां थीं, जिनमें वर्तमान में 45 प्रमुख वेदियां शेष हैं। पिंडदान की यात्रा पुनपुन घाट से शुरू होकर विभिन्न वेदियों पर संपन्न होती है। मान्यता है कि इस विधि से 21 कुलों के पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

सवाल- जनार्दन स्वामी मंदिर को दुनिया में अनोखा क्यों माना जाता है?
जवाब- गयाजी में अलग-अलग प्रकार की आत्माओं और धार्मिक विधानों के लिए अलग-अलग वेदियां हैं। प्रेतशिला, ब्रह्मवेदी, अक्षयवट जैसी वेदियों का अपना विशेष महत्व है। जनार्दन स्वामी मंदिर की विशेषता यह है कि यहां भगवान विष्णु स्वयं पिता और पुत्र दोनों स्वरूपों में माने जाते हैं। इसी कारण यहां जीवित व्यक्ति का आत्म पिंडदान कराया जाता है, जो दुनिया में अपनी तरह की अनोखी परंपरा मानी जाती है।

सवाल- क्या कोई भी व्यक्ति आत्म पिंडदान कर सकता है या इसके लिए विशेष नियम हैं?
जवाब- आत्म पिंडदान सभी लोगों के लिए नहीं होता। विशेष रूप से अविवाहित, संन्यासी या ऐसे लोग जिनकी संतान नहीं है अथवा जिन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया है, वे धार्मिक नियमों के अनुसार यह अनुष्ठान कर सकते हैं। इस विधि में भगवान जनार्दन स्वामी को ही पिता, पुत्र, आचार्य और साक्षी मानकर पिंड अर्पित किया जाता है।

सवाल- क्या आत्म पिंडदान के बाद परिवार और सांसारिक जीवन से संबंध खत्म हो जाता है?
जवाब- आत्म पिंडदान के बाद व्यक्ति को धार्मिक दृष्टि से स्वयं के लिए पिंडदान कराने की आवश्यकता नहीं रहती। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह सांसारिक जीवन छोड़ देता है। वह सामान्य जीवन जी सकता है, लेकिन धार्मिक मान्यता के अनुसार उसके लिए मृत्यु के बाद अलग से पिंडदान की आवश्यकता नहीं मानी जाती।

सवाल- क्या पितृपक्ष मेले में आत्म पिंडदान कराने वालों की संख्या बढ़ती है?
जवाब- पितृपक्ष मेले के दौरान ऐसे श्रद्धालु भी आते हैं, जिन्होंने संन्यास का मार्ग अपनाया हो या जो वैराग्य के भाव से प्रेरित हों। हालांकि आत्म पिंडदान कोई सामान्य अनुष्ठान नहीं है। इसके लिए तिथि, विधि और धार्मिक नियमों का पालन किया जाता है। जनार्दन स्वामी मंदिर में केवल जीवित व्यक्ति का ही आत्म पिंडदान कराया जाता है।

सवाल- क्या किसी धर्मग्रंथ में आत्म पिंडदान का उल्लेख मिलता है?
जवाब- गरुड़ पुराण में इस विधि का उल्लेख मिलता है। पुजारी आकाश गिरी के अनुसार, भगवान जनार्दन स्वामी और इस विशेष पिंडदान परंपरा का वर्णन गरुड़ पुराण के अध्यायों में किया गया है।

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