बाबा के दरबार में दुर्लभ बेलपत्रों की लगती है प्रदर्शनी

देश के द्वादश ज्योतिर्लिंग में एक केवल देवघर स्थित बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग में बेल पत्र प्रदर्शनी लगती है। बाबा मंदिर की पूजा व्यवस्था बांग्ला पंचांग से चलती है। इस तरह की दुर्लभ प्रदर्शनी बाकि ज्योर्तिलिंग में देखने को नहीं मिलती है।यह परंपरा बहुत प्राचीन है। संक्रांत से संक्रांत तक सावन के महीने में बैद्यनाथ मंदिर में बेलपत्र प्रदर्शनी की परंपरा है। सावन के प्रत्येक सोमवार को प्रदर्शनी लगाई जाती है। संक्रांत के हिसाब से सोमवार को प्रदर्शनी का समापन हो गया।
जिसे देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी। प्रदर्शनी में त्रिकुट पहाड़, बिहार के नरगंजो पहाड़ के दुर्लभ जंगल से बेलपत्र को तोड़कर पंडा समाज के सदस्य लाते हैं। प्रदर्शनी लगाते हैं और बाबा बैद्यनाथ को वह बेल पत्र अर्पित भी करते हैं।
यह भोलेनाथ को प्रसन्न करने और सब पर कृपा बरसाने की आराधना कहते हैं। चांदी के थाली में उसे खूबसूरती से सजाकर मंदिर प्रांगण में सजाते हैं। बेल पत्र की इस प्रदर्शनी को देखकर किसी का भी मन शिवमय हो जाता है। शिव को बेल पत्र प्रिय है।
शास्त्रों में वर्णित है कि बेलपत्र में तीन पत्तियां ब्रह्मा, विष्णु, महेश के समान हैं। जिसे बाबा पर अर्पित करने से भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं। बम बम बाबा ब्रह्मचारी के द्वारा यह बेलपत्र प्रदर्शनी की स्पर्धा शुरू करने का सबसे बड़ा कारण यह था कि लोग इसमें रूचि दिखाएं और बढ़ चढ़कर हिस्सा लें।
बेल पत्र प्रदर्शनी लगाने की परंपरा बमबम बाबा ब्रह्माचारी ने शुरू की थी, जिसका निर्वहन अनवरत जारी है। बच्चे बूढ़े जवान इस प्रदर्शनी में भाग लेने के लिए प्रत्येक साल बेलपत्र समाज के बैनर से जुड़ रहे हैं।
प्रदर्शनी में राजाराम विल्वपत्र समाज राम मंदिर में, पंडित मनोकामना राधेश्याम बेलपत्र समाज एवं राधेश्याम बेलपत्र समाज, आनंद भैरव मंदिर में प्रदर्शनी लगाते है। जबकि बरनेल समाज तारा मंदिर, जरनेल समाज काली मंदिर, बमबम बाबा ब्रह्मचारी समाज, शांति अखाड़ा बेलपत्र समाज एवं बमबम बाबा मशानी समाज लक्ष्मीनारायण मंदिर में आकर्षक प्रदर्शनी लगाते हैं। पुरोहितों व बांग्ला पंचांग के मुताबिक, सावन संक्रांत के बाद हर सोमवार को देवघर में बेलपत्र की प्रदर्शनी लगाई जाती है। प्रदर्शनी में पुरोहित समाज के ही लोग हिस्सा लेते हैं। यह प्रदर्शनी बांग्ला पंचांग के मुताबिक, सावन माह में संक्रांति के बाद हर सोमवार की शाम मंदिर परिसर में लगती है। इन बेलपत्रों को इकट्ठा कर चांदी के थाल में चिपकाया जाता है जिसके बाद विभिन्न बेलपत्र समाज अपने-अपने गंतव्य स्थान से ढोल बाजे गाजे के साथ नगर भ्रमण करते मंदिर पहुंचते हैं।
और मंदिर में प्रदर्शनी के बाद बाबा पर चढ़ाया जाता है।
पुरोहितों का कहना है कि किसी भी बेलपत्र को प्रदर्शनी में नहीं लाया जा सकता है। इस प्रदर्शनी में उन्हीं बेलपत्रों को शामिल किया जाता है, जिनकी खोज पुजारी समाज के लोग खुद जंगलों से करते हैं।
स्थानीय त्रिकुट पर्वत पर आज भी ऐसे कई बेल के पेड़ हैं जो दुर्लभ हैं। यहीं से बेलपत्रों को इकट्ठा किया जाता है। प्रदर्शनी में शामिल दुर्लभ बेलपत्रों की पहचान बुजुर्ग पुरोहित करते हैं। आखिरी सोमवार को सबसे अनोखे और अद्भुत बेलपत्र लाने वाले पुजारी समाज को इनाम दिया जाता था।

बावजूद आज भी यह प्राचीन परंपरा और प्रदर्शनी श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र रहती है। इस तरह की दुर्लभ प्रदर्शनी बाकि ज्योर्तिलिंग में देखने को नहीं मिलती है। यह परंपरा बहुत प्राचीन है।

बाबा का नाम लेकर पहाड़ और जंगल पर पुरोहित समाज के लोग चढ़ते हैं जहां पर न जाने कितने प्रकार के विषैले जीव जंतु होते हैं। बावजूद बाबा की कृपा से बेलपत्र तोड़ कर लाने वाले लोगों को कुछ भी नहीं होता है।

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