संपादकीय : पालना घरों की संख्या नहीं, उनकी उपयोगिता और सुरक्षा बने बिहार की प्राथमिकता

वरीय संपादक : धर्मेंद्र कुमार मिश्रा

बिहार में कामकाजी महिलाओं के छोटे बच्चों की देखभाल के लिए शुरू की गई पालना घर योजना निश्चित रूप से समय की जरूरत है। महिला को रोजगार या सरकारी सेवा में सक्रिय रहने के साथ अपने छोटे बच्चे की सुरक्षित देखभाल की चिंता न करनी पड़े, यही इस योजना का मूल उद्देश्य है। लेकिन सवाल यह है कि बिहार में संचालित पालना घर इस उद्देश्य को वास्तव में कितना पूरा कर रहे हैं? सरकारी और मीडिया रिपोर्टों में पालना घरों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आ रहे हैं। नवंबर 2024 में बिहार विधानसभा में सरकार की ओर से 124 पालना घर संचालित होने की जानकारी दी गई थी। वहीं फरवरी 2025 की रिपोर्ट में 67 सरकारी कार्यालयों में पालना घर संचालित होने और 33 नए केंद्र खोलने की तैयारी का उल्लेख किया गया। जून 2026 की एक रिपोर्ट में संचालित पालना घरों की संख्या 79 बताई गई और 21 नए पालना घर खोलकर संख्या 100 करने की योजना सामने आई। आंकड़ों में यह अंतर अपने आप में गंभीर सवाल खड़ा करता है।
सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि बिहार में वास्तविक रूप से कितने पालना घर संचालित हैं, कितने नियमित रूप से खुलते हैं और कितने केंद्रों में बच्चे पहुंच रहे हैं। प्रत्येक जिले और प्रत्येक पालना घर की स्थिति सार्वजनिक होनी चाहिए। जमीनी स्तर पर भी कई चुनौतियां सामने आती हैं। कहीं भवन और पर्याप्त स्थान की समस्या है तो कहीं कर्मियों की उपलब्धता और उपयोगिता का सवाल। नालंदा में कलेक्ट्रेट का पालना घर नियमित रूप से चलने की जानकारी सामने आई, लेकिन पुलिस लाइन में जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण दूसरा पालना घर शुरू नहीं हो सका। इससे स्पष्ट है कि योजना के विस्तार के साथ आधारभूत संरचना पर भी गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। पालना घर केवल एक कमरे और दो कर्मियों की व्यवस्था का नाम नहीं है। यहां सुरक्षित वातावरण, स्वच्छता, शुद्ध पेयजल, पौष्टिक आहार, बच्चों के अनुकूल शौचालय, पर्याप्त रोशनी और हवा, प्राथमिक उपचार तथा प्रशिक्षित कर्मियों की व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए। इसके साथ ही पालना घर में कार्यरत महिला कर्मियों की सुरक्षा और सम्मान भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

यदि किसी पालना घर की कर्मी को बच्चों की देखभाल के बजाय कार्यालयों में प्रचार-प्रसार, दूसरे विभागीय कार्यों या ऐसी ड्यूटी में लगाया जाता है, जिसके लिए उसकी नियुक्ति नहीं हुई है, तो यह योजना की मूल भावना पर प्रश्न खड़ा करता है। ऐसी स्थिति में लिखित आदेश, जिम्मेदारी और सुरक्षा व्यवस्था स्पष्ट होनी चाहिए। अब सरकार को केवल पालना घरों की संख्या बढ़ाने पर जोर देने के बजाय मौजूदा केंद्रों का सामाजिक और प्रशासनिक ऑडिट कराना चाहिए। प्रत्येक जिले के लिए सार्वजनिक पोर्टल पर पालना घर का पता, क्षमता, कर्मियों की संख्या, बच्चों की औसत उपस्थिति, उपलब्ध सुविधाएं, बजट एवं खर्च, निरीक्षण रिपोर्ट और शिकायतों की स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। हर पालना घर का नियमित निरीक्षण हो। बच्चों की सुरक्षा के लिए आवश्यक निगरानी व्यवस्था, आपातकालीन संपर्क नंबर और शिकायत निवारण तंत्र उपलब्ध हो। किसी भी प्रकार की लापरवाही को सामान्य प्रशासनिक कमी मानना बच्चों की सुरक्षा के साथ समझौता होगा।पालना घर वास्तव में महिला सशक्तीकरण की महत्वपूर्ण कड़ी है। जब एक कामकाजी मां अपने बच्चे को सुरक्षित हाथों में छोड़कर निश्चिंत होकर काम कर सकेगी, तभी इस योजना का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा। बिहार को अब केवल संख्या बढ़ाने की दौड़ से बाहर निकलकर गुणवत्ता, सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही पर ध्यान देना होगा। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कितने पालना घर खोले गए, बल्कि यह होना चाहिए कि उनमें से कितने वास्तव में बच्चों और कामकाजी महिलाओं के भरोसे पर खरे उतर रहे हैं।पालना घरों की संख्या नहीं, उनकी उपयोगिता और सुरक्षा ही इस योजना की असली सफलता का पैमाना बननी चाहिए।— धर्मेंद्र कुमार मिश्रा

वरीय संपादक, वरदान न्यूज

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