संपादकीय : स्वीकृत कंपनी का तराजू नहीं, दूसरी कंपनी का माल—विभागीय निगरानी पर सवाल

माप-तौल से जुड़ा कारोबार सीधे आम उपभोक्ताओं के हित, व्यापारिक पारदर्शिता और सही लेन-देन से जुड़ा है। ऐसे में यदि किसी लाइसेंस प्राप्त दुकानदार को इलेक्ट्रॉनिक तराजू बेचने के लिए किसी विशेष कंपनी का अनुमोदन प्राप्त है, लेकिन वह स्वीकृत कंपनी के बजाय स्थानीय बाजार में उपलब्ध दूसरी कंपनी के तराजू बेच रहा है, तो यह निश्चित रूप से जांच का विषय होना चाहिए।सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस दुकानदार को निर्धारित कंपनी के इलेक्ट्रॉनिक तराजू की बिक्री के लिए अनुमति मिली है, वह दूसरी कंपनी का उत्पाद किस आधार पर बेच रहा है? क्या विभाग को इसकी जानकारी है? यदि जानकारी है तो अब तक क्या कार्रवाई की गई? और यदि विभाग को इसकी जानकारी नहीं है तो फिर लाइसेंस प्राप्त दुकानों की निगरानी किस स्तर पर हो रही है?माप-तौल विभाग की जिम्मेदारी केवल लाइसेंस जारी करने तक सीमित नहीं हो सकती। लाइसेंस देने के बाद यह देखना भी विभाग का दायित्व है कि संबंधित दुकानदार वास्तव में उसी कंपनी के स्वीकृत उत्पाद बेच रहा है या नहीं, जो उसके लाइसेंस और अनुमोदन में दर्ज है। साथ ही तराजू के मॉडल, प्रमाणपत्र, बिल, सत्यापन और निर्धारित मानकों के अनुपालन की नियमित जांच भी आवश्यक है।इलेक्ट्रॉनिक तराजू कोई सामान्य उपभोक्ता वस्तु नहीं है। इसका सीधा संबंध रोजमर्रा के व्यापारिक लेन-देन से है। यदि किसी तराजू की गुणवत्ता या प्रमाणिकता संदिग्ध हो, तो उसका प्रभाव सीधे उपभोक्ता और व्यापारी दोनों पर पड़ सकता है। इसलिए ऐसे मामलों में विभागीय निगरानी केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि उपभोक्ता हित की सुरक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम है।स्थानीय स्तर पर यदि यह शिकायत सामने आती है कि स्वीकृत कंपनी के बजाय दूसरी कंपनी के तराजू बेचे जा रहे हैं और इसके बावजूद नियमित जांच या कार्रवाई नहीं हो रही है, तो स्वाभाविक रूप से विभागीय निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठेंगे। इससे विभाग और संबंधित दुकानदार के बीच मिलीभगत या संरक्षण की आशंका भी लोगों के मन में पैदा हो सकती है। हालांकि किसी अधिकारी या दुकानदार पर सांठगांठ का आरोप बिना निष्पक्ष जांच के सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं लगाया जा सकता। लेकिन ऐसी आशंकाओं को दूर करने की जिम्मेदारी भी संबंधित विभाग की ही है।इस मामले में विभाग को संबंधित दुकान के लाइसेंस और अनुमोदन की शर्तों की जांच करनी चाहिए। दुकान में उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक तराजुओं के ब्रांड, मॉडल, खरीद बिल, प्रमाणपत्र और अन्य आवश्यक दस्तावेजों का मिलान किया जाना चाहिए। यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि शिकायत में कोई सच्चाई नहीं है तो विभाग को जांच के बाद तथ्य सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

इस पूरे मामले में स्थानीय जिला पदाधिकारी को भी संज्ञान लेकर संबंधित विभाग से जांच रिपोर्ट मांगनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि लाइसेंस प्राप्त दुकानदार द्वारा स्वीकृत कंपनी के बजाय दूसरी कंपनी के तराजू बेचने की शिकायत में कितनी सच्चाई है और विभागीय स्तर पर अब तक क्या निगरानी की गई है। जिला प्रशासन की निष्पक्ष निगरानी से न केवल आम लोगों का भरोसा कायम होगा, बल्कि यदि कोई अनियमितता है तो उस पर समय रहते रोक भी लगाई जा सकेगी।जनता को केवल कार्रवाई के आश्वासन की नहीं, बल्कि पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था की जरूरत है। माप-तौल में छोटी-सी लापरवाही भी प्रतिदिन होने वाले हजारों लेन-देन को प्रभावित कर सकती है। इसलिए विभाग को कागजी लाइसेंस व्यवस्था से आगे बढ़कर नियमित निरीक्षण और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी।सवाल किसी एक दुकानदार का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता का है, जिसके भरोसे उपभोक्ता सही वजन और सही कीमत की उम्मीद करता है। अब देखना यह है कि विभाग और जिला प्रशासन इस शिकायत को महज एक आरोप मानकर छोड़ता है या निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाता है।

वरीय संपादक : धर्मेंद्र कुमार मिश्रा, वरदान न्यूज

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