बैकुंठनाथ मंदिर में स्थापित है 1201 रुद्री महादेव, शिवलिंग के साथ माँ पार्वती भी है बिराजमान

राजधानी पटना के खुशरूपुर स्थित बैकटपुर में बैकुंठनाथ शिव मंदिर स्थित है जहाँ शिवलिंग के अग्रभाग में माँ पार्वती विराजमान है। साथ ही 1200 लघु (छोटे) शिवलिंग विराजमान है, इस मंदिर में सावन के महीने में लाखो के संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक करने पहुंचते है। वही शिवरात्रि के मौके पर भी श्रद्धांलुओं की अपार भीड़ जलाभिषेक के लिए पहुँचती है।

ऐतिहासिक है यह शिव मंदिर

इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना है कहा जाता है की मंदिर का निर्माण 1576 ईo में राजा मानसिंह ने कराया था। राजा मानसिंह अकबर के सेनापति थे। इस मंदिर का मान्यता है की जो भी भक्त इस मंदिर मे पूजा अर्चना करते है उनका मनोकामना पूर्ण होता है। इस मंदिर को श्री गौरीशंकर बैकुंठपुर धाम के नाम से भी जाना जाता है।

बंगाल जाने के दौरान फसा था पानी वाला जहाज

कहा जाता है की बंगाल बिद्रोह के दौरान अकबर का सेनापति राजा मानसिंह गंगा नदी के रास्ते बंगाल जा रहा था तभी उसका जहाज गंगा नदी में फंस गया काफी जद्दोजहद के बाद भी जहाज आगे नहीं बढ़ रहा था। रात्रि सोते बक्त महादेव ने राजा मानसिंह को स्वपन दिया की हमारा शिवलिंग गंगा के तलहट में है जिसे निकाल कर स्थापित कर आगे बढ़ोगे तो तुम्हारी जीत पक्की होंगी। अहले सुबह राजा मानसिंह जगा और अपने गौतखोरो को गंगा नदी में उतारा। गौताखोरो द्वारा शिवलिंग को गंगा नदी से निकाला गया ( जिस जगह से निकला गया उसे आज कौरिया खांड के नाम से जाना जाता है) फिर शिवलिंग को बिधिबत मंदिर बना कर स्थापित किया गया।

माँ का अंतिम संस्कार किया था राजा मानसिंह

प्रसिद्ध इतिहासकार हेमिल्टन बुचनान ने अपने पुस्तक में यह व्याख्या किया था की बंगाल बिद्रोह में राजा मानसिंह की माँ रानी भगवती बाई (या रानी भगवती कँवर) उनके साथ थी और जब वह लौट रहे थे तब उनका निधन हो गया था जिसके बाद राजा मानसिंह अपनी माता का अंतिम संस्कार बैकुंठ धाम स्थित गंगा घाट पर बिधिबत किया किया था।

राबण बद्ध के बाद ब्रह्म हत्या के पाप के बाद आए थे राम

मंदिर का संबंध प्राचीनकाल से हैं, तब ये क्षेत्र बैकुंठ वन के नाम से जाना जाता था। आनंद रामायण में इस गांव की चर्चा बैकुंठा के रूप में हुई है। कहा जाता है की भगबान राम जब लंकापती राबण के बद्ध के बाद ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए इस मंदिर में आए थे। यहां आकर श्रीराम ने भगवान शिव की पूजा की थी। यह भी कहा जाता है कि यहां आने के लिए गंगा नदी के पार के एक गांव में श्रीरामचंद्र जी रात्रि विश्राम किया था, जिसके कारण उस गांव का नाम राघवपुर पड़ा जो वर्तमान में वैशाली जिले के राघोपुर के नाम से जाना जाता है।

राजगीर से प्रतिदिन पूजा करने आता था जरासंघ

कहा जाता है मंदिर का इतिहास महाभारत काल के जरासंध से भी जुड़ा हुआ है। जरासंध भगवान शंकर का बड़ा भक्त था। जरासंध रोज इस मंदिर में राजगृह से पूजा करने आता था। कहा जाता है की जरासंघ गंगा स्नान कर बाग से फूल बिनता और महादेव का पूजा अर्चना करता। (जिस जगह से जरासंघ फूल बीनता था उस जगह को आज फूलवरिया के नाम से जानते है।) मान्यताओं के अनुसार इसी बैकुण्ठ नाथ के आशीर्वाद से जरासंध को मारना असंभव था। कहते हैं कि जरासंध हमेशा अपनी बांह पर एक शिवलिंग की आकृति का ताबीज पहना करता था. क्योंकि जबतक वो ताबीज उशके पास है तो उसे कोई भी हरा नहीं सकता. इसलिए उसे हरा के लिए श्रीकृष्ण ने छल से जरासंध की बांह पर बंधे शिवलिंग को गंगा में प्रवाहित करवा दिया था और फिर उसे मारा गया।

आयोजन के दौरान काफी संख्या में जुटती है भीड़

पंडा पुजारियों का कहना है की इस धाम पर तरह तरह के आयोजन आयोजित किए जाते है जिसमे विवाह, यज्ञयोपबित संस्कार, मुंडन, रुद्राभिषेक के साथ अन्य आयोजन भी किया जाता है। जिससे काफी संख्या में भीड़ उमड़ती हैं।

चलाभिषेक का है बहुत महत्व

कहा जाता हैं की एक बूंद जल चढ़ाने पर बारह सौ एक महादेव का फल प्राप्त होता है। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां शिवलिंग रूप में भगवान शिव के साथ माता पार्वती भी विराजमान हैं, इतना ही नहीं पूरे शिवलिंग पर 100छोटे-छोटे शिवलिंग में बारह धारी भी बने हुए हैं।
इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि यहां भगवान शिव और पार्वती एक साथ एक ही शिवलिंग रूप में विराजमान हैं। छोटे शिवलिंगों को रूद्र कहा जाता है और ऐसा माना जाता है कि बैकठपुर जैसा शिवलिंग पूरी दुनिया में कहीं और नहीं है।

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