गंधवरिया राजपूत परिवार के पूर्वजों ने की थी पूजा की शुरुआत, आज भी पारंपरिक विधि-विधान से होते हैं अनुष्ठान; कंधों पर माता की प्रतिमा का ग्राम भ्रमण और शिव सागर में नौका-विहार है विशेष आकर्षण
सुपौल। बिहार के सुपौल जिले के सुखपुर ड्योढ़ी स्थित प्राचीन दुर्गा मंदिर में मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की परंपरा लगभग दो शताब्दियों से निरंतर चली आ रही है। गंधवरिया राजपूत परिवार के पूर्वजों द्वारा प्रारंभ की गई इस ऐतिहासिक धार्मिक परंपरा का आज भी पूरी श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक विधि-विधान के साथ निर्वहन किया जा रहा है। इस वर्ष भी परिवार की चौथी पीढ़ी के वंशजों ने इस विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभाली है।
पूजा समिति के अध्यक्ष प्रभात कुमार सिंह एवं सचिव डॉ. अखिल सिंह परमार ने बताया कि परिवार के कुलगुरु को स्वप्न में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना करने का निर्देश प्राप्त हुआ था। इसके बाद तत्कालीन जमींदार स्वर्गीय रामगुलाम बाबू ने कुलगुरु के निर्देशानुसार मां दुर्गा की प्रतिमा बनवाकर पूजा की शुरुआत की। तभी से गंधवरिया परिवार के सदस्य आपसी सहयोग, श्रद्धा और समर्पण के साथ इस परंपरा का निर्वहन करते आ रहे हैं।
दो शताब्दियों से सुरक्षित है पूजा का पारंपरिक स्वरूप
सुखपुर ड्योढ़ी के इस प्राचीन दुर्गा मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विशिष्ट पूजा-पद्धति है। लगभग 200 वर्षों से चली आ रही परंपरा में मूल धार्मिक रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों को सुरक्षित रखा गया है। शस्त्र पूजा, घोड़ा पूजा और हाथी पूजा जैसे पारंपरिक अनुष्ठान इस पूजा की विशिष्ट पहचान हैं। पूर्वजों द्वारा स्थापित परंपराओं का पालन आज भी उसी श्रद्धा और निष्ठा के साथ किया जाता है।
कलश स्थापना से शुरू होते हैं धार्मिक अनुष्ठान
पूजा की शुरुआत आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापना के साथ होती है। महाषष्ठी के दिन विधि-विधानपूर्वक मां दुर्गा को बेल वृक्ष पर आमंत्रित किया जाता है। यह अनुष्ठान देवी के आगमन के निमंत्रण के रूप में माना जाता है।
इसके बाद महासप्तमी के दिन सुबह से ही मां दुर्गा की प्रतिमा में प्राण-प्रतिष्ठा सहित विधिवत पूजा-अर्चना आरंभ होती है।
अष्टमी को सिंदूर अर्पण, नवमी को छाग बलि की परंपरा
महाष्टमी के दिन गंधवरिया परिवार की महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह परंपरा मंदिर की विशिष्ट धार्मिक पहचान का हिस्सा है और इसमें परिवार की महिलाओं की विशेष भागीदारी रहती है।
महानवमी के दिन पारंपरिक विधि-विधान से छाग बलि की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं। यह अनुष्ठान इस मंदिर की प्राचीन पूजा-पद्धति का एक विशिष्ट अंग है।
माता की प्रतिमा को कंधों पर उठाकर पूरे गांव का भ्रमण
विजयादशमी के अगले दिन सुखपुर ड्योढ़ी में मां दुर्गा की विदाई का दृश्य श्रद्धा, उत्साह और भावुकता से परिपूर्ण होता है। इस दिन श्रद्धालु मां दुर्गा की विशाल एवं भारी प्रतिमा को अपने कंधों पर उठाकर पूरे गांव का भ्रमण कराते हैं। प्रतिमा को कंधा देने के लिए युवाओं में विशेष उत्साह देखा जाता है। यह परंपरा सामूहिक आस्था, सहभागिता और गांव की सांस्कृतिक एकजुटता का अनूठा उदाहरण है।
ग्राम भ्रमण के बाद स्वर्गीय किशोर बाबू के घर के सामने स्थित ऐतिहासिक तालाब ‘शिव सागर’ में नौका पर मां दुर्गा की प्रतिमा को विराजमान किया जाता है। इसके बाद तालाब के नौ चक्कर लगाए जाते हैं। इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। अंततः मां दुर्गा को नम आंखों से विदाई दी जाती है और प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।
धार्मिक आस्था के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक
सुखपुर ड्योढ़ी का प्राचीन दुर्गा मंदिर केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक पहचान और पारिवारिक एकजुटता का भी प्रतीक है। लगभग 200 वर्षों से इस परंपरा का निरंतर निर्वहन इस बात का परिचायक है कि समय के बदलाव के बावजूद पूर्वजों की धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक धरोहर को संजोकर रखा गया है।
गंधवरिया राजपूत परिवार की चौथी पीढ़ी द्वारा इस परंपरा की जिम्मेदारी संभालना नई पीढ़ी के अपने पूर्वजों की विरासत के प्रति सम्मान, निष्ठा और समर्पण को दर्शाता है। सुखपुर ड्योढ़ी की यह परंपरा आज भी श्रद्धा, सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक निरंतरता की एक विशिष्ट मिसाल बनी हुई है।


